बचपन से ही शब्दों को पिरोने की आदत और बन गई कविता-धीरा खंडेलवाल, आईएएस

शुरूआत में धीरा हास्य,दर्द,सामाजिक और गंभीर विषयों में लिखा करती थी। भले की चार लाइन क्यों न हो। उस वक्त दोस्त यारों से प्रतिक्रियां व टिप्पणीयां मिलती थी, साथ ही प्रशंसा भी। या यूं कहे कि उन दिनों की प्रशंसा और टिप्पणीयों ने उनकी कविताओं को एक दिशा दी।

बचपन से ही शब्दों को पिरोने की आदत और बन गई कविता-धीरा खंडेलवाल, आईएएस
बचपन से ही शब्दों को पिरोने की आदत और बन गई कविता-धीरा खंडेलवाल, आईएएस

                                  बचपन से ही शब्दों को पिरोने की आदत और बन गई कविता-धीरा खंडेलवाल, आईएएस

धीरा खंडेलवाल हरियाणा कैडर की 1986 बैच की आईएएस अफसर हैं। साथ ही एक बेहतरीन कवित्री और लेखक भी। एक महिला होने के नाते घर परिवार व ऑफिस के अलावा कई तरह की जिम्मेदारियां निभाती हैं। लखनऊ से ताल्लुक रखने वाली धीरा को लिखने का शौक बचपन से ही था। धीरा कविता लिखने की शुरूआत के बारे में बताती हैं कि कविता लिखने की शुरूआत का पल, दिन महीना या साल तो याद नहीं है। लेकिन बचपन से अपने भावों और विचारों को भाषा के रूप में पिरोने की आदत थी।

जो अकसर एक लेखक और कवि के भीतर होती है। कभी कभी कुछ भाव, स्लोगन या ऐसा कुछ लिखा करती थी, जिसे आप कविता या फिर कविता लिखने की शुरूआत कह सकते हैं। धीरे धीरे इन भाव और विचारों ने कविता का रूप ले लिया। जो मेरी एक सुखद अनुभूति है। शुरूआत में धीरा हास्य,दर्द,सामाजिक और गंभीर विषयों में लिखा करती थी। भले की चार लाइन क्यों न हो। उस वक्त दोस्त यारों से प्रतिक्रियां व टिप्पणीयां मिलती थी, साथ ही प्रशंसा भी। या यूं कहे कि उन दिनों की प्रशंसा और टिप्पणीयों ने उनकी कविताओं को एक दिशा दी।


घर पर में पढऩे लिखने व सादगी का माहौल था। घर में पिताजी, बहनें, कविताएं, कहानियां और गजलें लिखा करती। लेकिन यह शौकिया तौर पर लिखते थे। वह आज भी कुछ न कुछ लिखती रहती हूं। उनकी कविता संग्रह मुखर मौन  और तारों की तरफ प्रकाशित हो चुकी है और जल्द ही उनकी कविताओं का कविता संग्रह ख्यालों के खलिहान प्रकाशित होने वाला है। धीरा को कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं। हाल ही में उनकी पुस्तक मन-मुकुर का विमोचन हरियाणा के राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी ने किया है।

उन्होंने अपनी इस कविता संग्रह के जरिए प्रकृति प्रेम, गरीबी विमर्श, औरत की विडंबना और समाज के विरोधाभासों को शब्दों के जरिए बयां किया है। इससे पहले भी धीरा का हाइकू संग्रह ‘तारों की तरफ’ प्रकाशित हो चुका है। धीरा कहती हैं कि आईएएस अफसर होना मेरी जिंदगी का एक हिस्सा है। जिंदगी नहीं। एक अफसर होने के नाते दायरा काफी बड़ा होता है। मसलन कई तरह के अनुभव मिलते हैं और यह महसूस किए जा सकते हैं। क्योंकि संवेदनाएं सभी के पास होती हैं और एक लेखक के नाते यह संवेदनाएं दर्द,सुख दुख आम आदमी की तुलना में ज्यादा महसूस किए जा सकते हैं।