Akhilesh Yadav: अखिलेश के दलित प्रेम में फंसी बहनजी, वोट बैंक पर नजर

Akhilesh Yadav: लोकसभा चुनाव के बाद बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन टूटने के बाद दिखने लगा है। जाहिर है कि सपा दलित वोटबैंक में सेंध लगाकर वर्ष 2022 में प्रदेश की सत्ता में वापसी का सपना देख रही है।

Akhilesh Yadav: अखिलेश के दलित प्रेम में फंसी बहनजी, वोट बैंक पर नजर

Akhilesh Yadav:  राज्य में होने वाले अगले साल चुनाव को देखते हुए समाजवादी पार्टी का दलित प्रेम जाग गया है और अब इसके कारण बहुजन समाज पार्टी की मुश्किलें बढ़ने लगी हैं। फिलहाल सपा के दलित कार्ड को लेकर बसपा को आपत्ति है। असल में बसपा काल में जिन दलित महापुरुषों के नाम पर बने जिलों के नाम समाजवादी सरकार द्वारा बदले गए थे, उन महापुरूषों के प्रति सपाइयों में जागा प्रेम चौंकाने वाला है। समाजवादी पार्टी को अब बाबा साहब आंबेडकर, कांशीराम व महात्मा फुले आदि राममनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव व जनेश्वर मिश्र जैसे दिखने लगे हैं। इसीलिए लोहिया वाहिनी गठित कर समाजवाद का परचम लहराने वाले बाबा साहेब वाहिनी के गठन की बातें करने लगे हैं। इतना ही नहीं, आंबेडकर जयंती पर दलित दिवाली मनाने की अपीलें की जाने लगी हैं।

समाजवादी पार्टी में यह रणनीतिक बदलाव गत लोकसभा चुनाव के बाद बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन टूटने के बाद दिखने लगा है। जाहिर है कि सपा दलित वोटबैंक में सेंध लगाकर वर्ष 2022 में प्रदेश की सत्ता में वापसी का सपना देख रही है। नेतृत्व को भरोसा है कि कमजोर दिख रही बसपा से छिटके दलित वोटों का एक बड़ा हिस्सा समाजवादी पार्टी के खाते में आ जाएगा। सपाइयों को यह उम्मीद इसलिए भी बढ़ी है, क्योंकि गठबंधन टूटने के बाद बसपा के असंतुष्टों की पहली पसंद साइकिल ही बनी है।

पिछले दिनों सपा में शामिल हुए बसपा के एक पूर्व मंत्री का कहना है कि बहनजी की मनमानी व हठधर्मिता के चलते दलितों में भारी मायूसी है। ये असंतुष्ट भाजपा का साथ देने के लिए भी राजी नहीं हैं। कांग्रेस का कोई भविष्य नजर नहीं आ रहा। ऐसे में समाजवादी पार्टी ही बेहतर विकल्प हो सकती है। बशर्ते, सपा में दलितों को अपनेपन का अहसास हो।

गठबंधन बिखरने और बसपा के छह विधायकों को तोड़ने से आक्रोशित मायावती समाजवादी पार्टी को सबक सिखाने का ऐलान कर चुकी हैं। उधर, सपा प्रमुख अखिलेश ने खुली घोषणा भले ही न की हो, परंतु बसपा को झटके पर झटका देने में लगे हैं। उनकी निगाहें दलित वोटबैंक पर लगी हैं। दलित चिंतक डा. चरण सिंह लिसाड़ी कहते हैं कि सपाइयों को उम्मीद है कि दलित महापुरुषों की जयंती व पुण्यतिथि मनाकर ही दलित वोट हासिल कर लेंगे। यह इतना आसान नहीं है, क्योंकि दलितों में एक बड़े वर्ग को भाजपा की नीतियां अधिक सुहा रही हैं।